मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। दोहा ।।

सीता-वचन कठोर शुनि, रावण लय तरुआरि ।। 65 ।।

यहन कथा हमरा कहति, सद्यः हम देब मारि ।। 66 ।।

।। चौपाइ ।।

मन्दोदरी कहल शुनू नाथ । अबला बध की अपनैँ हाथ ।। 67 ।।

विदित वीर अपनैँ ई नारि । अपयश पाप देब जौँ मारि ।। 68 ।।

अबला ऊपर एतटा रोष । कड़रिक तरु पर शितुआ चोष ।। 69 ।।

कृपणा मलिना दुर्ब्ब्ल देह । हिनका जीबहु मे सन्देह ।। 70 ।।

अन्न पानि कयलनि अछि त्याग । नहि करती पर-जन अनुराग ।। 71 ।।

अहँकाँ कोन कमी प्राणेश । जीतल भुज-बल सकलो देश ।। 72 ।।

सुर गन्धर्व्व सकल जन नाग । कन्या लयलैँ मनता भाग ।। 73 ।।

कन्या-जन मद-घूर्णित-नयन । अपनहि सुखसौँ अउती शयन ।। 74 ।।

।। दोहा ।।

रावण राक्षसि सौँ कहल, उत्कट त्रास देखाय ।। 75 ।।

अनुकूला सीता करह, जे बल बुद्धि उपाय ।। 76 ।।

दुइ मासमे करति ई, जौं हमरा सौँ प्रेम ।। 77 ।।

सकल राज्य-रानी हयति, हिनका सभ सुख क्षेम ।। 78 ।।

बहुत बुझौलय नहि बुझथि, बीति जाय दुइ मास ।। 79 ।।

हम आज्ञा दय डेल अछि, हिनकर करब विनाश ।। 80 ।।

।। चौपाइ ।।

अन्तःपुर गेला दश-भाल । वनिता-परिवृत गर्व्व विशाल ।। 81 ।।

विकटादिक सीता तट जाय । भयभीता कर स्वाङ्ग बनाय ।। 82 ।।

व्यर्थ तोर तन यौवन आस । भेल न दशमुख सौँ सहवास ।। 83 ।।

केओ कह हिनक अङ्ग सभ काट । केओ कह जीह सँ शोणित चाट ।। 84 ।।

अपने हठ अपने सुख खाय । होयत की पाछाँ पछताय ।। 85 ।।

केओ तरुआरी तेज लय हाथ । काटि लिअ हम हिनकर माथ ।। 86 ।।

केओ दौड़य बड़ गोटमुह बाय । की विलम्ब हम जाइछि खाय ।। 87 ।।

त्रिजटा कहल करह अन्याय । सीता नहि जानह असहाय ।। 88 ।।

हिनकर निकट भ्रमहूँ जनु जाह । अपने अपने तन बरु खाह ।। 89 ।।

यहि खन हम देखल अछि सपन । होयत सत्य बुझल मन अपन ।। 90 ।।

।। रूपमाला ।।

चढ़ल ऐराबतक ऊपर, राम लक्ष्मण सङ्ग ।। 91 ।।

दग्ध लङ्कापुरी भय गेल, समर रावण भङ्ग ।। 92 ।।

राम-सेवा कर विभीषण राज्य लङ्का पाय ।। 93 ।।

जानकी ई राम अङ्क-स्थिता भेली जाय ।। 94 ।।

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