मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। दोहा ।।

अन्तःपुर बाहरक शुनि, कल कल शब्द महान ।। 21 ।।

वृक्ष-खण्ड संलीन-तन, कर विचार हनुमान ।। 22 ।।

।। चौपाइ ।।

दशमुख वनिता-वृन्दक सङ्ग । आयल कज्जल-गिरि-वर रङ्ग ।। 23 ।।

किङ्किनि-नूपुर-शिञ्चित शुनि । दुष्ट निशाचर-आगम गूनि ।। 24 ।।

विश भुज लोचन दश गोट मुण्ड । सह सह सङ्ग राक्षसी झुण्ड ।। 25 ।।

अति विस्मित मन कह हनुमान । देखल शुनइत छलहूँ जे कान ।। 26 ।।

रहला द्रुब-दल दबकि नुकाय । अछि आगाँ कर्तव्य उपाय ।। 27 ।।

कर विचार रावण मन अपन । पुर्व्व रात्रि जे देखल सपन ।। 28 ।।

राम पठाओल वानर दूत । कामरूप बल बुद्धि बहुत ।। 29 ।।

टक टक ताकय तरु पर बैशि । बुझलक घाट बाट पुर पैशि ।। 30 ।।

कयल बहुत हम रामक दोष । एखनहु धरि हुनका नहि रोष ।। 31 ।।

कहिया मरण राम-कर हयत । माया-पाप-काय छुटि जयत ।। 32 ।।

एखनहु धरि नहि आबथि राम । कहिया होयत दिव्य संग्राम ।। 33 ।।

मनमे ज्ञान ऊपर अभिमान । चकमक भितर आगि समान ।। 34 ।।

वचन-बाण तेहन अनुसरब । सीता-मन अति कलुपति करब ।। 35 ।।

स्वप्न सत्य तौँ कपि देख लेत । रामचन्द्र काँ सभ कहि देत ।। 36 ।।

जौँ कपि होयता कहता जाय । लयोता सानुज राम बजाय ।। 37 ।।

ई मन गुनिकेँ सीता निकट । पहुँचल दशमुख दुर्म्म्द विकट ।। 38 ।।

सीता-दशा कहल नहि जाय । आत्ममध्य जनु रहलि समाय ।। 39 ।।

।। दोहा ।।

रावण सीता काँ कहल, सुमुखि सत्य वृतान्त ।। 40 ।।

राम न अयोता काज किछु, मनमे करू सिद्धान्त ।। 41 ।।

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