मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। षट्पद ।।

नारायण अवतार राम
त्रेता मे हयता ।। 68 ।।

पिता-वचन सह-बन्धु
जानकी सङ्गहि जयता ।। 69 ।।

माया-सीता ततय मूढ़
दशकन्धर हरता ।। 70 ।।

बालि मारि सुग्रीव सङ्ग
प्रभु मैत्री करता ।। 71 ।।

अहँ काँ तनिकर दूत कपि,
मारि मुका विकला करत ।। 72 ।।

कहलनि विधि शुनू लङ्किनी,
तखन बुझब रावण मरत ।। 73 ।।

।। चौपाइ ।।

वनिता-उपवन अरुण अशोक।
महा भयङ्करि राक्षसि लोक ।। 74 ।।

जनक-नन्दिनी छथि तहि ठाम।
शोभित वृक्ष शिंशपा नाम ।। 75 ।।

कि कहब शोभा देखब जाय।
हमहूँ धन्या दर्शन पाय ।। 76 ।।

विजय बनल अछि यश अवदात।
हमरा हानि कि सहि आघात ।। 77 ।।

देखब राम नवल-धनश्याम।
अयोता शीघ्र रहब यहि ठाम ।। 78 ।।

शुनि हरि हँसल चलल उत्साह।
घरहिक भेदिया लङ्का डाह ।। 79 ।।

जखन पवन-सुत रघुपति-चार।
दुर्ग-महोदधि उतरल पार ।। 80 ।।

दशमुख वाम अङ्ग भुज नयन।
फरकय लाग अभागक अयन ।।81।।

भल मन्द सगुन सकल फल जान।
कालक त्रास न दशमुख मान ।। 82 ।।

इति श्री चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे प्रथमोऽध्यायः

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