मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। चौपाइ ।।

कयल सगर-कुल बड़ उपकार।
तनिक बढ़ायोल भेलहुँ अपार ।। 41 ।।

तनिकहि वंश राम अवतार।
हुनक दूत जाइत छथि पार ।। 42 ।।

जलनिधि कहल जहन हित वाक।
जलसौँ उच्च भेला मैनाक ।। 43 ।।

काञ्चन-मणि-मय श्रृङ्ग अनूप।
ततय पुरुष एक दिव्य स्वरूप।।44।।

हे कपि हमर नाम मैनाक।
जलधि भितर डर मन मधवा क।।45।।

मारुत-नन्दन करू विशराम।
खाउ अमृत सन फल यही ठाम।।46।।

पथ विशराम न भोजन आज।
अछि कर्तव्य राम-प्रिय काज ।। 47 ।।

शिखरक परश हाथ सौँ कयल।
गगन-मार्ग पक्षी जकाँ धयल ।। 48 ।।

।। दोहा ।।

धयलक छाया-ग्राहिणी,
कयलक गमनक रोध ।। 49 ।।

हनुमानक मनमे तखन,
बाढ़ल अतिशय क्रोध ।। 50 ।।

घोरस्वरूपा सिंहिका,
छाया धय धय खाय ।। 51 ।।

नभचरकाँ ओ राक्षसी,
गगन गमन जे जाय ।। 52 ।।

देखल तनिकाँ मरुतसुत,
मारल झट दय लात ।। 53 ।।

पुनि उड़ि के चललाह से,
शान्ति भेल उत्पात ।। 54 ।।

।। हरिपद ।।

।। पदकुल दोहा वा ।।

गिरि त्रिकूटपर लङ्कानगरी
नाना तरु फल बेश ।। 55 ।।

नाना खग मृग गण सौँ शोभित
पुष्पलतावृत देश ।। 56 ।।

दुर्ग्ग दुर्ग्ग मे रोकत टोकत
चिन्तित मन-हनुमान ।। 57 ।।

करब प्रवेश राति कय तहि पुर
दिवा युक्ति नहि आन ।। 58 ।।

।। चौपाइ ।।

राम-चरण-सरसिज कय ध्यान।
सूक्ष्मरूप भेला हनुमान ।। 59 ।।

पुरी-प्रवेश कयल निशि जखन।
बुझलक लङ्का नगरी तखन ।। 60 ।।

कहलक गमहि चलल छी चोर।
हम करइत छी गञ्जन तोर ।। 61 ।।

बुझल न अछि दशकण्ठ-प्रताप।
चललहूँ कतय अहा चुपचाप ।। 62 ।।

चुप रह कहलैँ पढ़लक गारि।
चट दय लात चलौलक मारि ।। 63 ।।

वाम मुष्टि हरि हनल सुतारि।
खसली अवनीमे ओ हारि ।। 64 ।।

शोणित बान्ति करय कय बेरि।
करति कि यहन उपद्रव फेरि ।। 65 ।।

लङ्का देवी विकला कान।
बरिया काँ नहि लागय बान ।। 66 ।।

पुर्व्व विरञ्धि कहल छल जैह।
अनुभव होइछ भेल की सैह ।। 67 ।।

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