मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

दोबय छन्दः

मलिनवसन एक-वेणी अतिदुख, निराहार दुबराइल ।। 243 ।।

राम राम रट सकरुण धुनि कय, शुद्ध समाधि समाइलि ।। 244 ।।

अहह अशोकवाटिकाभ्यन्तर, वृक्ष-शिंशुपा छाया ।। 245 ।।

लङ्कापुरी राक्षसी-घेड़लि, छथि प्रभु अपनैँक माया ।। 246 ।।

कि करब यत्न फुरल नहि आन कयल तखन रघुपति-गुण-गान ।। 247 ।।

जैँ विधि प्रभु लेलनि अवतार हरण हेतु पृथिविक खल-भार ।। 248 ।।

धनुषभङ्ग परिणय जे रीति सकल शुनाओल मङ्गल गीति ।। 249 ।।

अयला प्रभु जे विधि वनवास सकल कथा से कयल प्रकाश ।। 250 ।।

आश्रमशून्य जानि लङ्केश देवी हरि अनलक एहि देश ।। 251 ।।

कथा शुनथि वैदेही कान मन-मन करथि अनुमान ।। 252 ।।

मैत्री जैँ विधि कयल कपीश अपनाओल प्रभु अपना दीश ।। 253 ।।

अनुज-नारि-रत बालि विचार तानकाँ रघुपति सत्वर मारि ।। 254 ।।

से सुग्रीव विदित कपिराज सम्प्रति प्रभु छथि तनिक समाज ।। 255 ।।

तनिक सचिव हम श्रीपति-दास सीता देखक बहुत प्रयास ।। 256 ।।

से कोन देश कोन से ठाम दूत पठाओल जतय न राम ।। 257 ।।

आज फलित भेल हमर प्रयास मानस-दुःख-राशि भेल नाश ।। 258 ।।

तकलनि कहलनि अमृत-समान वचन शुनाओल के ई कान ।। 259 ।।

लोचन-गोचर से भय जाथु कहथु कथा नहि एखन नुकाथु ।। 260 ।।

दूरहि सौँ हम कयल प्रणाम अञ्जलि-बद्ध-ठाढ़ तहिठाम ।। 261 ।।

सूक्ष्म-रूप वानर आकार हम प्रभु-चरित कहल विस्तार ।। 262 ।।

परिचय पूछलनि पूछलनि नाम नर-वानर-सङ्गति कोन ठाम ।। 263 ।।

स्वामिनी कथा पूछल जय बेरि हमहुँ शुनाओल से सभ फेरि ।। 264 ।।

प्रत्ययमूल मुद्रिका देल तखन प्रतीति तनिक मन भेल ।। 265 ।।

घनाक्षरी छन्द

गञ्जन ताड़न राक्षसीक सहै पड़इछ, एहेन विपति पड़उन जनु अनका ।। 266 ।।

हमर विपत्ति देखतहिँ छीय अपनहुँ, सपनहुँ चैन नहि दिन राति मनकाँ ।। 267 ।।

जनु मन राखथु हमर अपराध किछु, निवेदन कय देब धरणी-धरण काँ ।। 268 ।।

सकरुणा सजल-नयन देवी कहलनि, कहबनि अहाँ कपि विपति-हरण काँ ।। 269 ।।

चौपाई

सीता वचन करूण-परिपूर ।

शुनि शुनि कि करब से नहि फूर ।। 270 ।।

हे प्रभु कहलहुँ बहुत बुझाय ।

तनि घन-नयन न नोर सुखाय ।। 271 ।।

कर औँठी कङ्कण प्रभु-हाथ ।

तूअ वियोग भृश कृश रघुनाथ ।। 272 ।।

जायब अभिज्ञान काँ पाय ।

देल जाय श्रीजानकि माय ।। 273 ।।

चूड़ामणि देलनि कहि कानि ।

कत हम कयल विरञ्चिक हानि ।। 274 ।।

वासवसुत वायस वनवास ।

खल छल पहँचल मन निस्त्रास ।। 275 ।।

फल भाल पौलनि स्वामि-समीप ।

भय भ्रमि अयला सातो दीप ।। 276 ।।

अति सामर्थ्य प्रभुक सभ काल ।

के थिक दुर्न्नन्य खल दशभाल ।। 277 ।।

प्रभु-पत्नी पाबिय दुख घोर ।

जलधर जितल अखण्डित नोर ।। 278 ।।

देवर काँ हम वचन कठोर ।

कहल तकर फल भेल न थोर ।। 279 ।।

अनुचित क्षमा करत के आन ।

कहब दयामय देवर-कान ।। 280 ।।

संकट सौँ लय जाथि छोड़ाय ।

प्रभुक अनुज से करथु उपाय ।। 281 ।।

चलि नहि रहि नहि हाँ तहिठाम ।

आज्ञा विनु कत करू सङ्गम ।। 282 ।।

विकल स्वामिनी-दशा निहारि ।

चलयित कयलहुँ विपिन उजारि ।। 283 ।।

भेल लड़ाइ तहाँ घमासान ।

बहुत वीर समरहिँ निःप्राण ।। 284 ।।

दशवदनक सुत अक्षय कुमार ।

हमरहि सौँ तनिकर संहार ।। 285 ।।

मेघनाद आयल खिसिआय ।

रण निर्ज्जित कयलक अन्याय ।। 286 ।।

ब्रह्मास्त्र से कयल प्रयोग ।

बाँधल गेलहुँ कयल दुख-भोग ।। 287 ।।

लङ्का मे सञ्चित घृत तेल । हमरा बालधि अर्प्पित भेल ।। 288 ।।

सा ओ वसन लपेटल पूछ ।

मन जरि जायत वानर तूछ ।। 289 ।।

प्रभु-प्रताप नहि मानल हारि ।

सगर नगर घर हम देल जारि ।। 290 ।।

सोरठा

कर्म्म करत के आन, सुरदुर्ल्लभ हनुमान सन ।। 291 ।।

हित के अहँक समान, सजल-नयन रघुनाथ कह ।। 292 ।।

अतिसाहसधर वीर, अविरल भक्तिक भवन अहँ ।। 293 ।।

पिता अहाँक समीर, जगत्प्राण-सुत उचित थिक ।। 294 ।।

धनाक्षरी

नाव अरि लाब नहि उतरक दाब नहि, ।। 295 ।।

एक बुद्धि आब नहि सागर अपार में ।। 296 ।।

वीर अरि छोट नहि सङ्ग एक गोट नहि, ।। 297 ।।

लङ्का लघु कोट नहि विदित संसार में ।। 298 ।।

दनुज अबल नहि, पुरी गम्य थल नहि, ।। 299 ।।

प्रदेश अम्मल नहि युद्धक विचार मे ।। 300 ।।

अहाँक समान महि वीर हनुमान नहि, ।। 301।।

सर्व्वस्वक दान नहि तूल उपाकर मे ।। 302 ।।

इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिलाभाषा-रामायणे सुन्दरकाण्डे चतुर्थोध्यायस्समाप्तः सुन्दरकाण्ड समाप्त

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