मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

समानिका

मेघनाद की कहू, बुद्धि – होन छो अहूँ ।। 152 ।।

बाप पापकैल को, मृत्यु-मार्ग धैल को ।। 153 ।।

दोवय छन्दः

हरि-पद-विमुख कतहु सुख पाबथि, धिक थिक दशमुख – ज्ञाने ।। 154 ।।

दुर्गति कय कपि लङ्को जारय, धायलहिँ छथि अभिमाने ।। 155 ।।

एहि सौँ आब कि गञ्जन देखता, मरणाधिक अपमाने ।। 156 ।।

के कपि पकड़ लड़य के काल सौँ, नहि कपि-वीर समाने ।। 157 ।।

चौपाई

लङ्का-नगर सागर कपि डाह स्वामि-कार्य्य शूरित्व निर्वाह ।। 158 ।।

कुदि खसला सागर मे जाय पुच्छल बाँधल आगि मिझाय ।। 159 ।।

स्वस्थ -चित भेला हनुमान यहन पराक्रम कर के आन ।। 160 ।।

सीता-आशीष-बल नहि जरल लङ्कापति गर्व्व सभ हरल ।। 161 ।।

अग्नि वायु दुनु थिकथि इयार जरल न सखि – सम्बन्ध विचार ।। 162 ।।

जनिक नाम जपि छूट तिन ताप भवकृत – दोष – लेश नहि व्याप ।। 163 ।।

तनि रघुवरक दूतवर जानि प्राकृत आनल कयल नहि हानि ।। 164 ।।

हनुमानक डर केओ नहि बाज जनु कपि पायोल रामक राज ।। 165 ।।

जनकनन्दिनी छलि जहि ठाम घुरी पुन तनिकर कयल प्रणाम ।। 166 ।।

सानुज प्रभुवर अयाता तखन जननि ततय पहुँचब हम जखन ।। 167 ।।

तीनि प्रदक्षिण ई कहि देल आगाँ ठाढ़ जोड़ि कर भेल ।। 168 ।।

जे किछु बनल कयल हम काज दशकन्धर निर्ल्लज्ज कि वाज ।। 169 ।।

कहल जानकी शुनु कपि धीर सकल -नियन्ता श्री रघुवीर ।। 170 ।।

तनिकर इच्छा होयत जेहन कार्य्य – सिद्धि होयत शुभ तेहन ।। 171 ।।

पदाकुल दोहा

ओरे से दिन बीतल । नयनक नोर तोर वसन तितल ।। 172 ।।

आबि एकगोट कपि रावण जितल । करमक लिखल कतहु नहि चल ।। 173 ।।

करू करू जानकी जि ह्रदय शीतल । लङ्कापुर जरइछ प्रलय अनल ।। 174 ।।

सुखपाख सभ जन रावण हीतल । “चन्द्र” भन ठाढ़ जनु प्रतिमा लिखल ।। 175 ।।

षट्पद छन्द

हम किङ्कर हनुमान, देवि चिन्ता चित परिहरु ।। 176 ।।

हमरा काँधा चढ़लि, घोर सागर काँ सन्तरु ।। 177 ।।

त्क्षण मे श्रीरघुनाथ निकट कौशल पहुँचायब ।। 178 ।।

आज्ञा प्रभुसौँ पाबि, फरि लङ्का घुरि आयब ।। 179 ।।

प्रलय करब लङ्कापुरी, हमरा के रोकत सुभट ।। 180 ।।

जौँ ई रूचि हो स्वामिनी, देल जाय आज्ञा प्रगट ।। 181 ।।

शरसौँ शोषि समेद्र सेतुम शर – निकरक करता ।। 182 ।।

सानुज से प्रभु आबि, रावणक प्राणे हरता ।। 183 ।।

सुग्रीवक सभ सैन्य, आबि लङ्का कैँ लूटै ।। 184 ।।

सुयश लोक मे होयत, अचल लङ्कागढ़ टूटै ।। 185 ।।

हम मारुत-सुत प्राण काँ, कानहुँ यत्न राखब एतय ।। 186 ।।

कुशलत्क्षेम सौँ जाउ अहँ, श्रीरघुनन्दन छथि जतय ।। 187 ।।

दोबय

कयल प्रणाम अनेक वार कपिम पर्व्व्त पर चढ़ि गेला ।। 188 ।।

योजन तीश प्रमाण उच्च गिरि, समभूमिक सम भेला ।। 189 ।।

पर्व्वत वायु वेग सौँ महितल, दवि गेल तत्काले ।। 190 ।।

सागर तरथि घोर धुनि करइत, धर्म्मक सोर पताले ।। 191 ।।

चौपाई

अङ्गदादि कयलनि अनुमान। अबइत छथि हर्षित हनुमान ।। 192 ।।

शब्द एहेन करता के आन। श्रवण-सुखद वर अमृत समान ।। 193 ।।

एतहु सकल कपि बालि-किशोर । हर्षक शब्द कयल नहि थोर ।। 194 ।।

गिरि पर पहुँचि गेला हनुमान । मृतक देह जनु पलटल प्राण ।। 195 ।।

कार्य्यसिद्धि होइछ अनुमान । हर्षक सुख मुख-शोभा आन ।। 196 ।।

शस्त्रक क्षत कत देखिय अङ्ग । भेल समर जनि लगइछ रङ्ग ।। 197 ।।

महावीर कह शुनू प्रिय सर्व्व । प्रभु-प्रताप किछु हमर न गर्व्व ।। 198 ।।

देखि जनकजा विपिन उजारि । रक्षक जन केँ रण मे मारि ।। 199 ।।

कि करब ततय पड़ल बड़ मारि । राम-प्रताप कतहु नहि हारि ।। 200 ।।

दशकन्धर सौँ वाद विवाद । बचलहुँ श्री रघुनाथ-प्रासाद ।। 201 ।।

अयलहुँ बहुत सुभट केँ मारि । रावण-पालित लङ्का जारि ।। 202 ।।

राम-कपिशक तट हम जयब । एखनहि ततहि स्वस्थ हम हयब ।। 203 ।।

वानर -वृन्द मिलल भरि अङ्क । जेहन परशमणि पाबथि रङ्क ।। 204 ।।

पूछ चूमि गुणगण सभ बाँच । हरषि हरषि हरिगणा भल नाँच ।। 205 ।।

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