मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

द्वितीय त्रिभंगी छन्द

दशमुख-वचन शुनल कपि कहलनि ।। 69।।

चुप रे अभिमानी, करतौ हानि, कटु बानी ।। 70 ।।

प्रभुकर-शरक निकर विषधर सन ।। 71 ।।

लागलैँ के बच प्रानी, शठ अज्ञानी, वक-ध्यानी ।। 72 ।। 𑒢

अपनहिँ मन नृप बनल सनल छह ।। 73 ।।

कहतौ के गुरु तोरा, शुनू स्त्री-चोर, कुल बोरा ।। 74 ।।

हित अनहित अनहित हित कयलह ।। 75 ।।

प्रभुक न कयल निहोरा, मति घोरा, शुभ थोरा ।। 76 ।।

घनाक्षरी

सत्य हनुमान तौँ प्रमाण ई वचन जान ।। 77 ।।

मर्क्कट विकट भालू-भट वश परबैँ ।। 78 ।।

प्रभु-दल प्रबल जखन उतरत इत ।। 79 ।।

दशमुख तखन उपाय कोन करबैँ ।। 80 ।।

मुष्टिका-अघात लात-लात -सन्निपात वश ।। 81 ।।

शोचवश रण मे त्राहि त्राहिकैँ कहरबैँ ।। 82 ।।

“चन्द्र” भन रामचन्द्र सर्व्वनाश-हाथ-तीर ।। 83 ।।

लगतहु जखन तखन मूढ़ मरबैँ ।। 84 ।।

चौपाई

मारुत-वचन शुनल लङ्केश । कोप-विवश जन देल निदेश ।। 85 ।।

हम कटु वचन शुनै छी कान । वानर बजइछ आनक आन ।। 86 ।।

हिनका मारय लय कय खण्ड । हिनकर सभ छूटय पाखण्ड ।। 87 ।।

कपिकाँ मारय दौड़ल जखन । अयला सभा विभीषण तखन ।। 88 ।।

कहलनि नितिशास्त्र – अनुसार । चारक वध नहि अछि व्यवहार ।। 89 ।।

दूत बेचारा मारल जयत । रामचन्द्र सौँ युद्ध न हयत ।। 90।।

अङ्कित हयता कहता जाय । राखक नहि थिक दूत बझाय ।। 91 ।।

निति विभीषण कहलहुँ नीक । मानल वचन सदर्थ अहीँक ।। 92 ।।

शण मन बहुत वस्त्र घृत तेल । ढेर भेल नृप आज्ञा देल ।। 93 ।।

कपि – वालधि मे सभ लपटाब। कौतुक करइत नृपति हसाब ।। 94 ।।

किछु तहि ऊपर आगि लगाब। के बुझ भावि काल स्वभाव ।। 95 ।।

मारथि गारि देथि कय बेरि। योगी सौँ कयलनि धुरखेरि ।। 96 ।।

नाना तरहक बाजन बाज। प्रबल चोर काँ पकड़ल आज ।। 97 ।।

पश्चिम द्वार पवन – सुत जाय। बन्धन लेलनि सहज छाड़ाय ।। 98 ।।

सूक्ष्मरूप सौँ गेल बहराय। सभ राक्षस-मन देल शुखाय ।। 99 ।।

सभ जन ह्रदय कदलि सन काँप । जनु कपि भेल चोटाओल साप ।। 100 ।।

कपिकाँ मन मे अछि बड़ रोष । करत उपद्रव पुन भरि पोष ।। 101 ।।

रावण-सभा उठल घमलौड़ि । ऐठन जरल न जरि गेल जौड़ि ।। 102 ।।

के थिक केहन न कयल विचार । मूर्खक लाठी माँझ कपार ।। 103 ।।

के कह कपि कपि – रूपी काल । नहि बुझ लङ्कापति दशभाल ।। 104 ।।

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