मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। रावणोक्ति।।

।। बसन्त-तिलका छन्दः।।

के तोँ थिकाँहि कत सौँ यत आबि गेलैँ ।। 23 ।।

की नाम तोहर निशाचर-भक्ष्य भेलैँ ।। 24 ।।

आज्ञा-विहीन फल तोड़ि बहुत खेलैँ ।। 25 ।।

तिर्हेतु रक्षक तहाँ किय मारि देलैँ ।। 26 ।।

।। हनुमानक उक्ति।।

रे दुष्ट लागल क्षुधा फल तोड़ि खेलौ ।। 27 ।।

कैलैँ उपद्रव ततै तरु तोड़ि देलौ ।। 28 ।।

हेतौ बहूत नहि सम्प्रति विघ्न भेलौ ।। 29 ।।

अस्त्र-प्रहार कयलैँ हम प्राण लेलौ ।। 30 ।।

।। मालिनी-छन्दः।।

राघुपतिक पठौलैँ लाँघि केँ सिन्धु एलौ ।। 31 ।।

तनिक कुशल-वार्त्ता जानकी कैँ शुनेलौ ।। 32 ।।

क्षुधित बहुत भेलैँ तैँ फलाहार कैलौ ।। 33 ।।

मरुत-सुत हनुमान्नाम की बाँधि लेलौ ।। 34 ।।

किछु दिन रहि लङ्का सिन्धु केँ फानि जैबे ।। 35 ।।

जनक-नृपति-पुत्री दुःख वार्त्ता शुनैबे ।। 36 ।।

प्रबल सकल सेना सङ्ग लै फेरि ऐबे ।। 37 ।।

तखन बुझब जे छी से आहाकाँ बुझैबै ।। 38 ।।

।। भुजङ्गप्रयात छन्दः।।

चिन्हारे अहाँ छी विरञ्चि-प्रपौत्रे ।। 39 ।।

कुकर्म्मी अहाँ छी करैछी कि श्रैत्रे ।। 40 ।।

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