मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। अथ चतुर्थोऽध्यायः ।।

।। चौपाई ।।

बाँधल काँ पुरजन मिलि मार । कौतुक पहुँचल दशमुख-द्वार ।। 1 ।।

त्रास-हीन हर्षित हनुमान । केवल कौशलेश-पद ध्यान ।। 2 ।।

मारि गारि सबहिक सहि लेथि । पामर काँ नहि उत्तर देथि ।। 3 ।।

मेघनाद कहलनि शुनू तात । कयलक ई वानर उत्पात ।। 4 ।।

ब्रह्मास्त्रैँ हम जीतल जखन । वानर वशमे आयल तखन ।। 5 ।।

कहल जाय की समुचित मन्त्र । वानर काँ नहि करब स्वतन्त्र ।। 6 ।।

लौकिक वानर सन नहि कर्म्म । अपनहिँ जानब हिनकर मर्म्म ।। 7 ।।

ताकि प्रहस्त सचिव सौँ कहल । विषय विचार करक जे रहल ।। 8 ।।

पुछू वानर केँ मन्त्रि प्रहस्त । बौआयल कपि कालक ग्रस्त ।। 9 ।।

की आयल अछि की अछि काज । वानर सौँ बजइत हो लाज ।। 10 ।।

कथि लय कयलक उपवन नाश । राक्षस वध करइत नहि त्रास ।। 11 ।।

कहलनि मन्त्रि प्रहस्त प्रकाश । कपि मनमे नहि मानब त्रास ।। 12 ।।

प्रेषित ककर कहब से साँच । प्राण अहाँक अवश्ये बाँध ।। 13 ।।

कहलनि हरि बड़ गोट मोर भाग । दूरक ढोल सोहाओन लाग ।। 14 ।।

।। दोवय छन्दः।।

भूषल छलहुँ सङ्ग नहि खर्चा, तोड़ि तोड़ि फल कयलहुँ ।। 15 ।।

रक्षक लण्ठ प्राण लेबा पर, बहुत नेहोरा खयलहुँ ।। 16 ।।

कान कपार एक नहि बुझल, पातैँ पात नुकयलहुँ ।। 17 ।।

अपन स्वरूप धयल हम सभकाँ, कालक धाम पठयलहुँ ।। 18 ।।

पहिलय मारि बहुत हम सहलहुँ, पाछाँ अनुचित कयलहुँ ।। 19 ।।

दश-मस्तक लङ्कापति राजा, की अपने खिसिअयलहुँ ।। 20 ।।

एक गोट वानर पर एते, सेना व्यर्थ पठयलहुँ ।। 21 ।।

धर्म्म-शास्त्र-वेत्ता अपनैँ सन, न्याय करू अगुतयलहुँ ।। 22 ।।

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