मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। दोबय छन्दः ।।

शुनितहिँ शीघ्र पठाओल सेना, बहुत निकट भट गेला ।। 160 ।।

लोहदण्ड-धर जहँ उदण्ड कपि, तनिकर सन्मुख भेला ।। 161 ।।

सिंहनाद कय सभकाँ मारल, नहि रण मे कपि हारल ।। 162 ।।

अर्द्ध-मरण सभ भेल कतो जन, रावण निकट पुकारल ।। 163 ।।

महाकाल वानर-तन धयलनि लङ्का-नाशक कारण ।। 164 ।।

क्षणमे विपिन अशोक उजाड़ल, फल-चय कयलनि पारण ।। 165 ।।

साहस लङ्का निर्भय आयल, के करताह निवारण ।। 166 ।।

लङ्कापति अपनहुँ चलि देखू, की थिक करू निर्धारण ।। 167 ।।

।। रूपमाला ।।

गेल छल सङ्ग्राम किङ्कर, निहत शुनि दशभाल ।। 168 ।।

कोप सौँ सत्वर पठाओल पाँच सेना-पाल ।। 169 ।।

स्तम्भ लौहक हाथ लयकैँ, तनिक तेहन हाल ।। 170 ।।

कयल मारुत-तनय विजयी, समरमे तत्काल ।। 171 ।।

तखन मन्त्रिक सात बालक, युद्ध उद्यत भेल ।। 172 ।।

क्रोध सौँ रावण पठाओल, गेल इर्ष्या लेल ।। 173 ।।

सकल जनकेँ मारि मारुत-तनय पुन तहि ठाम ।। 174 ।।

स्तम्भ लौहक अस्त्र एकटा, जितल भल संग्राम ।। 175 ।।

।। चौपाई।।

अगुआ चलला अक्षयकुमार । कयल बहुत सेना सहिआर ।। 176 ।।

ततय बाट तकितहिँ हनुमान । के पुन अओता जयतनि प्राण ।। 177 ।।

अबइत देखल अक्षयकुमार । मनमन मानल हर्ष अपार ।। 178 ।।

मुदगर कर लय उड़ल आकाश । सत्वर हिनकर करब विनाश ।। 179 ।।

मुदगर लय कर लगले घूरि । रावण-सुतक माथ देल चूरि ।। 180 ।।

रणमे माँचल हाहाकार । मुइला मुइला अक्षयकुमार ।। 181 ।।

कन्नारोहट उठ बड़ घोल । लड़त कहाँ के भभरल गोल ।। 182 ।।

सेना लड़ि लेलक भरिपोष । के सह मारुत-नन्दन रोष ।। 183 ।।

वार्ता विदित भेल दरबार । नहि छथि जिबइत अक्षयकुमार ।। 184 ।।

शुनि रावणमन पैशल शोक । बाहर छल भल बुझय न लोक ।। 185 ।।

छल छथि अतिबल प्रबल प्रताप । रावण सन जनिकाँ छथि बाप ।। 186 ।।

मेघनाद सन जनिकाँ भाय । वानर-हाथ मरण अन्याय ।। 187 ।।

लङ्कापति-मन कोप अपार । मेघनाद सौँ कयल विचार ।। 188 ।।

कय बेरि बजला भेल अन्धेरि । हम अपनहिँ जायब एहि बेरि ।। 189 ।।

अक्षयकुमारक अरि जहिठाम । ततय जाय जोतब सङ्ग्राम ।। 190 ।।

मारब अथवा बाँधब जाय । अहँइक लग हम देब’ पहुँचाय ।। 191 ।।

मेघनाद कहलनि शुनु तात । बानर कयलक अछि उत्पात ।। 192 ।।

शोक-वचन जनु बाजल जाय । हम जिबइत छी अक्षयक भाय ।। 193 ।।

आनब अपनेक निकट बझय । हमर पराक्रम देखल जाय ।। 194 ।।

।। चरणाकुल दोहा।।

ई कहि रथ चढ़ि राक्षस भट लय, मेघनाद चललाह ।। 195 ।।

मारुत-नन्दन शत्रु-निकन्दन, कपिवर जतय छलाह ।। 196 ।।

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