मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। चौपाई।।

विकटा-गण मन गेलि डराय । कल कौशल सीता लग जाय ।। 129 ।।

कहु कहु जानकि कपि निर्भीक । बुझला जाइछ थिकथि अहीँके ।। 130 ।।

बजइत छलहुँ कलपि किछु सञ्च । चुप चुप कयल कि अहाँ प्रपञ्च ।। 131 ।।

हमरा त्रास अहाँ निस्त्रास । मन मे जनु दृढ भय गेल आश ।। 132 ।।

कनइत छलहुँ भेलहुँ अछि चूप । देखि पड़ आनन हर्षक रूप ।। 133 ।।

जानकि कहू करी जनु लाथ । कहिया अओता पति रघुनाथ ।। 134 ।।

सभ जनि शुनू विपतलि कि बाज । थिक प्रपञ्च किछु राक्षस-राज ।। 135 ।।

अपनहिँ सभहिँ कहू की थिक । राक्षस माया-ज्ञान अधीक ।। 136 ।।

राक्षसि-दशा कहल की जाय । गमहि गमहि सभ गेलि पड़ाय ।। 137 ।।

।। दोहा।।

सीता कारागार मे, यामिक दनुजी जानि ।। 138 ।।

दशमुख पूछलनि कह कुशल, भयभीता अनुमानि ।। 139 ।।

।। दोवय छन्द।।

त्रास देखाय करू वश सीता, कहल भेल की अयलहुँ ।। 140 ।।

सीताकाँ एकसरि की त्यागल, एको जनि उचित न कयलहुँ ।। 141 ।।

दशमुख-वचन शुनल से कहलनि, सेवा कयल अघयलहुँ ।। 142 ।।

मर्क्कट एहन विकट नहि देखल, लय लय प्राण पड़यलहुँ ।। 143 ।।

रक्षक मध्य एको जन नहि छथि, तनिके वार्त्ता लयलहुँ ।। 144 ।।

सकल अशोक वाटिका उजड़ल, सीता निकट नुकयलहुँ ।। 145 ।।

राजकीय पन्थैँ के सञ्चर, उबटे पथ धय अयलहुँ ।। 146 ।।

सीता त्रास देखाबय गेलहुँ, अपनहिँ तत्रासित भेलहुँ ।। 147 ।।

।। पदाकुल दोहा।।

सीता मन आनन्दित देखल, पूछलैँ कयलनि लाथ ।। 148 ।।

हुनकर रङ्ग तेहन सन देखल, लङ्का-जय जनु हाथ ।। 149 ।।

निर्भय कपि की सहजहिँ जायत, भिड़ता से मरताह ।। 150 ।।

कालरूप कपि सङ्गर भेलैँ, नहि घर केओ घुरताह ।। 151 ।।

।। घनाक्षरी ।।

जानकी निकट हम जायब कि घूरि पुन ।। 152 ।।

कनक-भूधर सन वानर विशाल से ।। 153 ।।

काँच ओ पाकल फल एको न बचल हाय ।। 154 ।।

खाय सभ गेल कत गोट मुह गाल से ।। 155 ।।

आयल कहाँ सौँ कहाँ छल हम देखल न ।। 156 ।।

बाल दिनकर सन बड़ मुह लाल से ।। 157 ।।

देखू दशभाल की अशोक-वन हाल भेल ।। 158 ।।

मरि गेल रक्षक बेहट्ट कपि काल से ।। 159 ।।

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