मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। चौपाई ।।

चिन्हल मुद्रिका माथा धयल । कत विलाप कनइत तत कयल ।। 60 ।।

कियक कयल रघुवर-कर त्याग । हमरे सन की भेल अभाग ।। 61 ।।

राम भवन वन हम अहँ बाट । सब जनि स्नान कयल एक घाट ।। 62 ।।

के कर वनिता-जन विश्वास । कहु कहु मुद्रा वचन प्रकाश ।। 63 ।।

प्राण-वान कपि कयलहुँ आय । मरितहूँ एहिखन सङ्कट पाय ।। 64 ।।

प्रभुकाँ अहँक सदृश नहि आन । हमरहु भेल विदित अनुमान ।। 65 ।।

हमरा निकट पठाओल नाथ । देल मुद्रिका अहँइक हाथ ।। 66 ।।

गञ्जन दुःख देखल प्रत्यक्ष । कहबनि सानुज प्रभुक समक्ष ।। 67 ।।

दया करथु आबथु राघुनाथ । यम-घर पहुँच शीघ्र दशमाथ ।। 68 ।।

दूइ मास जखना बिति जायत । नहि जौँ अयोता राक्षस खायत ।। 69 ।।

कपिपति सहित सैन्य समुदाय । लय आबयु सङ्क छुटि जाय ।। 70 ।।

यावत नहि रावण-संहार । ताबत हमरा कारागार ।। 71 ।।

तेहन उपाय करब हनुमान । सत्वर रावण त्यागय प्राण ।। 72 ।।

मारुत-सुत कह शुनू जगदम्ब । हमरा जयबा धरिक बिलम्ब ।। 73 ।।

ककरा रावण कयल न आट । हुनका यमघर गेलहिँ बाट ।। 74 ।।

सायुध अयोता लक्ष्मण राम । अहँ काँ लय जयता निज धाम ।। 75 ।।

पूछल जानकी कहु कहु कीश । कुशल करथु अहँ काँ जगदीश ।। 76 ।।

।। चरणकुल दोहा।।

लाँघि समुद्र सहित कपिसेना, सानुज करुणागेह ।। 77 ।।

अयोता कोन उपाय कहू कपि, हमरा मन सन्देह ।। 78 ।।

।। चौपाई।।

हमरा काँध चढ़ल दुहु बन्धु। अयोता लाँघि अगम्य कि सिन्धु ।। 79 ।।

सैन्य सहित कपि बालिक भाय । सभकेँ लओता गगन उड़ाय ।। 80 ।।

से कर रावण सगण विनाश । हुनका नहि रण कालक त्रास ।। 81 ।।

आज्ञा देल जाय हम जाउ । रावणारि केँ सत्वर लाउ ।। 82 ।।

देल मुद्रिका परिचय काज । प्रत्यय-पात्र हमहुँ तैँ आज ।। 83 ।।

परिचायक किछु भेटय तेहन । कहब शुनल देखल अछि जेहन ।। 84 ।।

चूड़ामणि देल सहित विचार । दीना दीनदयालुक दार ।। 85 ।।

कागत मसि नहि अछि यहि ठाम । कोटि कोटि कहि देब प्रणाम ।। 86 ।।

जिबइत छथि जानकि तहि देश । दशमुख विशभुज बस असुरेश ।। 87 ।।

चित्रकूट गिरि जखन निवास । गुप्त-कथा कहि देब प्रकाश ।। 88 ।।

शयित छला प्रभु हमरा अङ्क । सुख सुषुप्ति प्रिय काँ निश्शङ्क ।। 89 ।।

इन्द्रक बालक कालक फेर । काक बनल आयल ओहि बेर ।। 90 ।।

चरणाङ्गुष्ठ मे चञ्चु प्रहार । अबितहिँ कयलक रहित-विचार ।। 91 ।।

के दुख देलक अहँकाँ दुष्ट । जगला लगला पुछय रुष्ट ।। 92 ।।

अपनहुँ देखल तखनहुँ काक । उड़ि उड़ि आबय निर्भय ताक ।। 93 ।।

चहलक पुन हम मारब लोल । उठल निवारण कारण घोल ।। 94 ।।

तृणकाँ लय दिव्यास्त्र बनाय । तनिकाँ ऊपर देल चलाय ।। 95 ।।

देखलनि ज्वलित अबै अछि बाण । कि कहब उड़ला लै के प्राण ।। 96 ।।

इन्द्रादिक नहि रक्षा कयल । फिरि घुरि पुन प्रभु-शरणे धयल ।। 97 ।।

त्राहि त्राहि राखू एहि बेरि । करब उपद्रव हम नहि फेरि ।। 98 ।।

चरण न छोड़ गेल लपटाय । अस्त्र अमोघ वृथा नहि जाय ।। 99 ।।

इन्द्रक बालक कौआ जाह । एक आँखि कय देबहु कनाह ।। 100 ।।

काक-स्वरूप ज्ञात संसार । आकृति जेहन तेहन व्यवहार ।। 101 ।।

से पौरुष से प्रभु रघुनाथ अजगुत जिबितहिँ अछि दशमाथ ।। 102 ।।

ई शुनि कहल तखन हनुमान । अयोता शीघ्र राम भगवान ।। 103 ।।

लङ्का नगरी सकल उजारि जयता घर घुरि रावण मारि ।। 104 ।।

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