मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। गीत ।।

हमर विधि प्राण अपन भेल भार ।। 141 ।।

की सुख भुजि छथि ओ ई देहमे, कतहु कि नहि आधार ।। 142 ।।

जौँ आबथि रघुनन्दन सानुज, लीला सागर पार ।। 143 ।।

गृद्धझुण्ड दशमुण्ड-मुण्ड पर कर खर नखर प्रहार ।। 144 ।।

ककरा कहब केओ नहि मानुष, नहि कारुणिक चिन्हार ।। 145 ।।

रक्षा करथि अरक्षित जनकाँ, केवल धर्म्म उदार ।। 146 ।।

कठिन विषय विष तिष नहि भेटय, खड़ग न लग तिष-धार ।। 147 ।।

शिव शिव जीव-घात वर मानल, धिक जीवन संसार ।। 148 ।।

रामचन्द्र-चन्द्रिका थिकहूँ हम, सपन न मन व्यभिचार ।। 149 ।।

विधि बुद्धि विरहिणि व्याकुलि एकसरि चित चिन्ता विस्तार ।। 150 ।।

।। सवैया मुदिरा ।।

हा रघुनाथ अनाथ जकाँ, दशकण्ठ-पुरी हम आइलि छी ।। 151 ।।

सिंहक त्रास महावनमे हरिणीक समान डराइलि छी ।। 152 ।।

चन्द्र-चकोरि अहैँक सदा, हम शोक-समुद्र समाइलि छी ।। 153 ।।

देवर-दोष कहू हम की, अपना अपराध सँ काइलि छी ।। 154 ।।

।। दोहा ।।

जनक जनक जननि अवनि, रघुनन्दन प्राणेश ।। 155 ।।

देवर लक्ष्मण हमर छथि, नैहर मिथिला देश ।। 156 ।।

।। इति श्री चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे द्वितीयोऽध्यायः ।।

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