मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। गीत काफी ।।

सपन हम देखल अचिन्तित राति ।। 117 ।।

विद्रुम-रक्त-वदन तेजोमय, अद्भुत वानर जाति ।। 118 ।।

प्रभु-प्रेषित पथोनिधि सन्तरि, लङ्का-परिचय पाबि ।। 119 ।।

हम विधिहता शुनल शुभ वार्ता, इष्ट अनिष्ट कि भावि ।। 120 ।।

जे दिन लङ्का प्रलय होइछ नहि, से दिन पापिक भाग ।। 121 ।।

इ अन्याय घोर लङ्कामे, पानिसौँ आगि न लाग ।। 122 ।।

सुरपति-सुतक परभाव-दायक, कोशल कौशल भूप ।। 123 ।।

से शर से कर से रघुवर वर, कत बैसल छथि चूप ।। 124 ।।

।। गीत ।।

से दिन कोना होयत मनोरथ पूर ।। 125 ।।

रघुनन्दन-बल प्रलय पवन सम, अधम निशाचर तूर ।। 126 ।।

देवर-तीर जेहन प्रलयानल, रावणगण वन झूर ।। 127 ।।

के हम थिकहुँ ककर हम कामिनि, परिचय पओता कूर ।। 128 ।।

सकल तमीचर तामस तम सम, श्रीरघुनन्दन सूर ।। 129 ।।

हमर यहन गति दैव देखै छथि, नहि उपाय किछु फूर ।। 130 ।।

तीरक तेज समुद्र सुखायत, जल थल उड़त धूर ।। 131 ।।

कोटि शनैश्चर सहित सङ्कटा, लङ्का घर घर घूर ।। 132 ।।

।। गीत ।।

केहन विधि लिखल वपत्ति-तति भाल ।। 133 ।।

कुल पवित्र कुल-कामिनी हमरहि, कठिन विपत्ति जंजाल ।। 134 ।।

रघुनन्दन पति देवर लक्ष्मण, जनि डर काँपय काल ।। 135 ।।

चोर दशानन त्रास देखाबय, अनुचित कह वाचाल ।। 136 ।।

दनुज-बधू कह मारब काटब, चाटब शोणित लाल ।। 137 ।।

यहि अवसर जौँ ओ प्रभु आबथि, देखथि सबटा हाल ।। 138 ।।

काल-दूत जानि हेम-हरिण छल, छल न बुझल ततकाल ।। 139 ।।

कालहि सिंह-घरणि तट निर्भय, गरवित सरब श्रृगाल ।। 140 ।।

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